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मगर झोपड़ी खड़ी नहीं

रात में ही आ गए थे मगर सुबह हुई नहीं  मकान की तलाश मगर झोपड़ी खड़ी नहीं | काश , किस कदर मुंहतकी निगाह से देखता रहूँ  क्यों निर्झर पंख...
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लघुकथा / अंतर

लघुकथा /   अंतर  बस खचाखच भरी थी | कन्डक्टर महोदय मनमाने ढंग से किराया वसूलते जा रहे थे , किसी से कम , किसी से ज्यादा | ऐसा लगता था कि ...
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